Santoshi Mata Vrat Katha in Hindiसंतोषी माता व्रत कथा

Below is the complete Santoshi Mata Vrat Katha in Hindi, the story that devotees hear with gud and chana in hand at every Friday puja; for the same story in English, see the English katha.

बुढ़िया और उसके सात बेटे

बहुत पुराने समय की बात है। एक नगर में एक बुढ़िया रहती थी। उसके सात बेटे थे। छह बेटे कमाते थे और घर का खर्च चलाते थे, पर सबसे छोटा बेटा कुछ काम नहीं करता था। वह दिन भर इधर-उधर घूमता रहता और समय पर घर आकर खाना खा लेता।

बुढ़िया अपने छहों कमाऊ बेटों को बड़े प्रेम से भोजन कराती थी। जब वे खाकर उठ जाते, तो उनकी थालियों में जो जूठन बचती, उसे इकट्ठा करके वह सबसे छोटे बेटे को परोस देती। छोटा बेटा भोला था, उसे इस बात का पता ही नहीं था। वह जो मिलता, चुपचाप खा लेता।

एक दिन छोटे बेटे ने अपनी पत्नी से कहा, "देखो, मेरी माँ मुझसे कितना प्रेम करती है।" पत्नी ने धीरे से कहा, "प्रेम क्यों नहीं करेगी, तुम्हें सबकी जूठन जो खिलाती है।" बेटे को यह बात बहुत बुरी लगी। उसने कहा, "जब तक मैं अपनी आँखों से न देख लूँ, तब तक मैं यह बात नहीं मानूँगा।" पत्नी ने हँसकर कहा, "तो देख लेना।"

जूठन का सच और परदेस की राह

कुछ दिन बाद एक त्योहार आया। घर में तरह-तरह के पकवान बने, चूरमे के लड्डू भी बने। छोटे बेटे ने सोचा कि आज सच्चाई जाननी ही है। वह सिर दुखने का बहाना करके एक पतला कपड़ा ओढ़कर रसोई में ही एक ओर लेट गया और कपड़े के भीतर से सब देखता रहा।

छहों भाई खाने बैठे। माँ ने उन्हें प्रेम से लड्डू और पकवान परोसे। जब वे खाकर उठ गए, तो माँ ने उनकी थालियों से लड्डुओं के टुकड़े और बचा हुआ भोजन उठाकर एक थाली में रखा और छोटे बेटे को आवाज़ दी, "उठ बेटा, तेरे भाई खा चुके हैं, अब तू भी खा ले।" बेटे ने कहा, "माँ, मुझे भोजन नहीं करना है। मैं परदेस जा रहा हूँ।" माँ ने कहा, "कल जाता हो तो आज ही चला जा।" बेटे ने कहा, "हाँ, आज ही जा रहा हूँ।" और वह घर से निकल पड़ा।

जाते समय उसे अपनी पत्नी की याद आई। पत्नी उस समय गोशाला में उपले थाप रही थी। वह उसके पास गया और बोला, "मैं कमाने के लिए परदेस जा रहा हूँ। कुछ समय बाद लौटूँगा। तुम संतोष से रहना और अपना धर्म निभाना।" पत्नी की आँखें भर आईं। उसने कहा, "आप निश्चिंत होकर जाइए, पर कोई निशानी देते जाइए।" पति के पास और कुछ नहीं था, उसने अपनी अँगूठी उतारकर दे दी और कहा, "तुम भी मुझे कोई निशानी दो।" पत्नी के हाथ गोबर से सने थे। उसने गोबर से भरे हाथ की छाप उसकी पीठ पर लगा दी। पति चल पड़ा।

सेठ के यहाँ नौकरी और बढ़ता धन

चलते-चलते वह बहुत दूर एक बड़े नगर में पहुँचा। वहाँ एक सेठ की बड़ी दुकान थी। उसने सेठ के पास जाकर कहा, "सेठ जी, मुझे काम पर रख लीजिए।" सेठ को भी एक आदमी की ज़रूरत थी। उसने पूछा, "तनख्वाह क्या लोगे?" लड़के ने कहा, "काम देखकर जो उचित लगे, दे दीजिए।" सेठ ने उसे रख लिया।

वह सुबह से रात तक मन लगाकर काम करने लगा। उसकी ईमानदारी और मेहनत देखकर कुछ ही दिनों में वह दुकान का सारा लेन-देन, हिसाब-किताब और ग्राहकों से व्यवहार अच्छी तरह सँभालने लगा। सेठ के सात-आठ नौकर थे, पर सबसे अधिक भरोसा सेठ को इसी पर हो गया। तीन महीने में सेठ ने उसे मुनाफे में आधे का हिस्सेदार बना लिया। कुछ ही वर्षों में वह नगर का एक प्रसिद्ध और धनी व्यापारी बन गया।

पर धन और काम के बीच वह अपने घर को, अपनी माँ को और अपनी पत्नी को बिल्कुल भूल गया। न कोई चिट्ठी भेजी, न कोई पैसा।

बहू के कष्ट के दिन

उधर घर पर उसकी पत्नी पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा। सास और जेठानियाँ उससे घर का सारा भारी काम करातीं। उसे रोज़ जंगल में लकड़ी लाने भेजा जाता। घर के लोग अच्छा भोजन करते, और उसे भूसी की रोटी दी जाती और नारियल के खोपरे में पानी। वह चुपचाप सब सहती रही और पति की राह देखती रही।

एक दिन जंगल से लकड़ी लेकर लौटते समय रास्ते में उसने देखा कि बहुत सी स्त्रियाँ एक जगह बैठी कुछ पूजा कर रही हैं। वह वहीं रुक गई और पूछा, "बहनो, आप यह किस देवता का व्रत कर रही हैं? इसे करने से क्या फल मिलता है और इसकी विधि क्या है? कृपा करके मुझे भी बताइए।"

संतोषी माता के व्रत का ज्ञान

एक स्त्री ने बड़े प्रेम से कहा, "बहन, यह संतोषी माता का व्रत है। ऐसा माना जाता है कि इसे श्रद्धा से करने पर दरिद्रता और चिंता दूर होती है, मन को संतोष मिलता है और माँ अपने भक्तों की मनोकामना पूरी करती हैं।"

फिर उसने विधि बताई: "अपनी सामर्थ्य के अनुसार सवा आने का या जितना हो सके, गुड़ और चना ले लो। हर शुक्रवार को नहा-धोकर संतोषी माता की पूजा करो, गुड़-चना हाथ में लेकर कथा सुनो। बीच में कोई शुक्रवार न छोड़ना और लगातार सोलह शुक्रवार तक व्रत करना। कथा सुनने वाला कोई न मिले तो दीपक जलाकर या किसी चीज़ को सामने रखकर स्वयं कथा कहना। उस दिन खटाई बिल्कुल न खाना और किसी को खटाई देना भी नहीं। दिन में एक बार भोजन करना। जब सोलह शुक्रवार पूरे हो जाएँ, तब उद्यापन करना। उद्यापन के दिन आठ लड़कों को खीर, पूड़ी और चने की सब्ज़ी का भोजन कराना, उन्हें भी खटाई न देना।"

यह सुनकर बहू का मन खिल उठा। रास्ते में उसने लकड़ी का गट्ठर बेचा और जो पैसे मिले, उनसे गुड़-चना ले लिया। उसने मन में व्रत करने का संकल्प किया और आगे चलते हुए संतोषी माता के मंदिर में पहुँची। वहाँ माँ के चरणों में गिरकर बोली, "माँ, मैं कुछ नहीं जानती, न मुझे पूजा की विधि ठीक से आती है। मैं बहुत दुखी हूँ। आपकी शरण में आई हूँ, मेरा दुख दूर करो।" माँ को उसकी भोली भक्ति पर दया आ गई।

पति की चिट्ठी और पैसा

बहू ने पूरे मन से शुक्रवार का व्रत शुरू कर दिया। एक शुक्रवार बीता, दूसरा शुक्रवार आया, तो परदेस से पति का पत्र आ गया। तीसरे शुक्रवार को उसका भेजा हुआ पैसा भी आ गया। यह देखकर जेठ-जेठानियाँ जलने लगीं। वे ताने मारने लगीं, "अब तो इसके पास पैसा आने लगा है, अब इसकी खातिर बढ़ जाएगी।"

बहू सरल मन की थी। वह फिर मंदिर गई और माँ से बोली, "माँ, मैंने आपसे पैसा नहीं माँगा था। मुझे पैसे से क्या काम? मुझे तो अपने पति के दर्शन चाहिए। मेरा सुहाग मेरे पास लौट आए, यही मेरी विनती है।" माँ ने प्रसन्न होकर कहा, "जा बेटी, तेरा पति जल्दी आएगा।" बहू खुशी से भरकर घर लौट आई।

माँ ने सपने में पति को याद दिलाया

संतोषी माता सोचने लगीं कि इस भोली बेटी को मैंने वचन दे दिया है, पर इसका पति तो इसे सपने में भी याद नहीं करता। उसे याद दिलाने के लिए मुझे ही जाना होगा। उस रात माँ उस बेटे के सपने में प्रकट हुईं और बोलीं, "साहूकार के बेटे, सोता है या जागता है?" वह बोला, "माँ, न सोता हूँ न जागता हूँ, बीच में हूँ। कहिए, क्या आज्ञा है?" माँ ने कहा, "तेरा घर-बार है कि नहीं? तेरी पत्नी वहाँ कितना कष्ट सह रही है, कभी उसकी भी सुध ले।"

बेटे को सब याद आ गया। उसने कहा, "माँ, मुझे सब याद है, पर यहाँ मेरा बहुत बड़ा कारोबार फैला है। सेठ का सारा हिसाब चुकाए बिना और माल बेचे बिना मैं कैसे जाऊँ?" माँ ने कहा, "सवेरे नहा-धोकर संतोषी माता का नाम लेकर घी का दीपक जलाना और दुकान पर जाकर बैठ जाना। देखते ही देखते तेरा सारा काम पूरा हो जाएगा।"

सुबह उसने यह सपना सेठ को बताया। सेठ ने भी कहा, "घर-परिवार की सुध लेना तो धर्म है, जाओ।" उसने माँ के कहे अनुसार दीपक जलाया और दुकान पर बैठ गया। थोड़ी ही देर में ग्राहक आने लगे, सारा माल बिक गया, जिनसे पैसा लेना था वे स्वयं देने आ गए, और सेठ की सहायता से साँझ तक सारा हिसाब पूरा हो गया। बेटे ने मन ही मन संतोषी माता को प्रणाम किया, घर वालों के लिए गहने, कपड़े और बहुत सा सामान लिया और घर की ओर चल पड़ा।

घर वापसी और लकड़ी का गट्ठर

उधर बहू रोज़ की तरह जंगल से लकड़ी लेकर लौट रही थी। थककर वह संतोषी माता के मंदिर पर ठहरी। माँ ने उससे कहा, "बेटी, तेरा पति आ रहा है। आज तू लकड़ी के तीन गट्ठर बनाना। एक नदी किनारे रखना, एक मेरे मंदिर पर और एक सिर पर रखकर घर जाना। घर पहुँचकर ऊँचे स्वर में कहना: सासू जी, लकड़ी का गट्ठर लो, भूसी की रोटी दो और नारियल के खोपरे में पानी दो। आज मेहमान कौन आया है?"

उसका पति उसी रास्ते से आ रहा था। नदी किनारे लकड़ी का गट्ठर देखकर वह रुक गया और वहीं विश्राम करने लगा। फिर मंदिर पर भी गट्ठर देखा, तो सोच में पड़ गया। उधर बहू सिर पर गट्ठर रखकर घर पहुँची और आँगन में उसे पटककर माँ के बताए शब्द ज़ोर से कह दिए। सास बात सँभालने के लिए बोली, "बहू, ऐसा क्यों कहती है? तेरा पति आया है। आ, मीठा भात खा और अच्छे कपड़े पहन।"

तभी पति भी घर पहुँच गया। अपनी पत्नी की बात सुनकर और उसकी दशा देखकर वह समझ गया कि उसके पीछे इसके साथ कैसा व्यवहार हुआ है। उसने माँ से पूछा, "माँ, यह कौन है?" माँ बोली, "बेटा, यह तेरी बहू है। दिन भर घूमती रहती है, कोई काम नहीं करती।" बेटे ने कहा, "माँ, मैंने इसे भी देखा है और तुम्हें भी। अब मुझे दूसरे घर की चाबी दो, मैं वहीं रहूँगा।" वह अपनी पत्नी के साथ अलग घर में रहने लगा। जो कुछ लाया था, उससे घर भर गया और दोनों सुख से रहने लगे।

उद्यापन में खटाई और कठिन परीक्षा

सोलह शुक्रवार पूरे होने पर बहू ने पति से उद्यापन की बात कही। पति ने सहर्ष हामी भरी। बहू ने उद्यापन की तैयारी की और जेठ के लड़कों को भोजन का निमंत्रण दिया। जेठानियों के मन में जलन थी। उन्होंने अपने बच्चों को सिखा दिया, "भोजन के समय खटाई माँगना, जिससे इसका उद्यापन पूरा न हो।"

लड़के आए, उन्होंने खीर, पूड़ी और चने की सब्ज़ी पेट भरकर खाई, फिर खटाई माँगने लगे: "हमें खटाई दो, हमें खटाई अच्छी लगती है।" बहू ने कहा, "आज संतोषी माता का उद्यापन है, आज खटाई किसी को नहीं दी जाती।" तब लड़के बोले, "तो हमें पैसे दो।" भोली बहू ने कुछ सोचे बिना उन्हें पैसे दे दिए। लड़कों ने उन पैसों से बाज़ार जाकर इमली खरीदी और खाई। इस प्रकार व्रत का नियम टूट गया।

संतोषी माता अप्रसन्न हो गईं। उसी समय राजा के दूत आए और उसके पति को पकड़कर ले गए। जेठ-जेठानियाँ ताने मारने लगीं, "लूटकर धन लाया था, अब पता चलेगा।" बहू यह सब सह न सकी। वह रोती हुई मंदिर गई और माँ के चरणों में गिरकर बोली, "माँ, यह तूने क्या किया? पहले हँसाकर अब रुला रही हो।"

माँ ने कहा, "बेटी, तूने उद्यापन में मेरा नियम तोड़ा है। तूने लड़कों को पैसे दिए और उन्होंने खटाई खा ली। इतनी जल्दी सब भूल गई?" बहू ने हाथ जोड़कर कहा, "माँ, भूल मुझसे हुई है, पर अनजाने में हुई है। लड़कों ने ज़िद की और मैंने पैसे दे दिए। मुझे क्षमा करो। मैं फिर से तुम्हारा उद्यापन करूँगी।" माँ ने कहा, "जा, अब भूल मत करना। तेरा पति तुझे रास्ते में आता मिलेगा।"

फिर से उद्यापन और माँ की कृपा

बहू घर लौट रही थी कि रास्ते में उसका पति आता हुआ मिल गया। उसने पूछा, "आपको कहाँ ले गए थे?" पति बोला, "जो धन मैं कमाकर लाया था, उसका कर राजा ने माँगा था। वही भरने गया था।" बहू ने माँ को मन ही मन धन्यवाद दिया और दोनों प्रसन्न होकर घर आ गए।

अगले शुक्रवार को बहू ने फिर से पूरे नियम से व्रत किया और उद्यापन की तैयारी की। इस बार उसने ब्राह्मणों के आठ लड़कों को भोजन के लिए बुलाया। उन्हें खीर, पूड़ी और चने की सब्ज़ी खिलाई, खटाई का नाम भी नहीं आने दिया। भोजन के बाद उसने लड़कों को पैसे नहीं, बल्कि एक-एक फल दक्षिणा में दिया, ताकि कोई बाज़ार जाकर खटाई न खरीद ले। इस तरह उद्यापन विधिपूर्वक पूरा हुआ।

संतोषी माता प्रसन्न हुईं। घर में फिर से सुख-समृद्धि लौट आई। कुछ समय बाद माँ की कृपा से बहू को चंद्रमा जैसा सुंदर पुत्र हुआ। वह बेटे को लेकर रोज़ माँ के मंदिर जाने लगी।

माँ का भयानक रूप और सबका कल्याण

एक दिन संतोषी माता के मन में आया कि चलकर देखूँ, यह मेरी बेटी रोज़ मेरे पास आती है, आज मैं इसके घर चलूँ। माँ ने बड़ा भयानक रूप धारण किया: मुँह पर गुड़ और चने लिपटे थे, होंठ सूजे हुए थे और उन पर मक्खियाँ भिनभिना रही थीं। इस रूप में माँ उसकी ससुराल के द्वार पर पहुँचीं।

देहरी पर पैर रखते ही सास चिल्ला उठी, "देखो, कोई चुड़ैल चली आ रही है! लड़कों को भगाओ, नहीं तो यह किसी को खा जाएगी।" बच्चे डरकर भागने लगे और घर के लोग दरवाज़े, खिड़कियाँ बंद करने लगे। बहू ने रोशनदान से झाँककर देखा तो खुशी से चिल्ला उठी, "आज मेरी माता मेरे घर आई हैं!" और दौड़कर बच्चे को माँ की गोद की ओर ले चली।

सास गुस्से में बोली, "इसे देखकर कैसी पगली हो गई है? बच्चे को इसके पास क्यों ले जाती है?" बहू ने विनम्रता से कहा, "सासू जी, जिनका मैं व्रत करती हूँ, ये वही संतोषी माता हैं।" इतना कहकर उसने घर के सारे किवाड़ खोल दिए और माँ का प्रेम से स्वागत किया।

यह सुनकर सबकी आँखें खुल गईं। सास और जेठानियाँ माँ के चरणों में गिर पड़ीं और बोलीं, "माँ, हम मूर्ख हैं, अज्ञानी हैं। हमें तुम्हारे व्रत की विधि नहीं पता थी। हमने तुम्हारा व्रत भंग करके बड़ा अपराध किया है। जगदम्बा, हमें क्षमा करो।" माँ का मन पिघल गया। उन्होंने सबको क्षमा कर दिया और पूरे परिवार को आशीर्वाद दिया। उस दिन से घर में प्रेम, सुख और संतोष बना रहा, और परिवार के सब लोग श्रद्धा से माँ का व्रत करने लगे।

हे संतोषी माता, जैसे तुमने उस बहू पर कृपा की, उसके दुख दूर किए और उसके परिवार को सुख और संतोष दिया, वैसे ही इस कथा को कहने, पढ़ने और सुनने वाले सब भक्तों पर अपनी कृपा बनाए रखना। सबके घर में सुख, शांति और संतोष रहे।

बोलो संतोषी माता की जय!

How to listen to the katha

The katha is the centre of the Friday puja. It is read or heard after the picture of Santoshi Mata has been worshipped and before the aarti. The full order of the puja is on the Santoshi Mata vrat vidhi page; the points below cover the katha itself. Customs vary between families, so follow your own tradition where it differs.

  1. Place the kalash of water before the Mother with a small bowl of gud and chana on its mouth, and light the ghee lamp and incense.
  2. Take a little gud and chana in your right hand and keep it there while the katha is read. Everyone listening may do the same.
  3. Read slowly and clearly, aloud if family members are listening. If no one is there to listen, many devotees light a lamp and tell the katha to it, as the women in the story advise.
  4. Try not to get up or talk in between, and keep your mind on the Mother.
  5. At the end, say "Bolo Santoshi Mata ki Jai" together, then sing the aarti "Jai Santoshi Mata".
  6. After the aarti, the gud and chana from the hand is traditionally given to a cow (or put aside respectfully), and the rest of the gud-chana prasad is shared. The kalash water is sprinkled around the home and the rest is poured on a tulsi plant.

Remember the lesson of the story: on vrat Fridays nothing sour is eaten or given to anyone. When your Fridays are complete, the udyapan vidhi page explains how to feed the eight boys and why they are given a gift rather than money. The same story is also available as the Santoshi Mata Vrat Katha in English.

बुढ़िया और उसके सात बेटे

बहुत पुराने समय की बात है। एक नगर में एक बुढ़िया रहती थी। उसके सात बेटे थे। छह बेटे कमाते थे और घर का खर्च चलाते थे, पर सबसे छोटा बेटा कुछ काम नहीं करता था। वह दिन भर इधर-उधर घूमता रहता और समय पर घर आकर खाना खा लेता।

बुढ़िया अपने छहों कमाऊ बेटों को बड़े प्रेम से भोजन कराती थी। जब वे खाकर उठ जाते, तो उनकी थालियों में जो जूठन बचती, उसे इकट्ठा करके वह सबसे छोटे बेटे को परोस देती। छोटा बेटा भोला था, उसे इस बात का पता ही नहीं था। वह जो मिलता, चुपचाप खा लेता।

एक दिन छोटे बेटे ने अपनी पत्नी से कहा, "देखो, मेरी माँ मुझसे कितना प्रेम करती है।" पत्नी ने धीरे से कहा, "प्रेम क्यों नहीं करेगी, तुम्हें सबकी जूठन जो खिलाती है।" बेटे को यह बात बहुत बुरी लगी। उसने कहा, "जब तक मैं अपनी आँखों से न देख लूँ, तब तक मैं यह बात नहीं मानूँगा।" पत्नी ने हँसकर कहा, "तो देख लेना।"

जूठन का सच और परदेस की राह

कुछ दिन बाद एक त्योहार आया। घर में तरह-तरह के पकवान बने, चूरमे के लड्डू भी बने। छोटे बेटे ने सोचा कि आज सच्चाई जाननी ही है। वह सिर दुखने का बहाना करके एक पतला कपड़ा ओढ़कर रसोई में ही एक ओर लेट गया और कपड़े के भीतर से सब देखता रहा।

छहों भाई खाने बैठे। माँ ने उन्हें प्रेम से लड्डू और पकवान परोसे। जब वे खाकर उठ गए, तो माँ ने उनकी थालियों से लड्डुओं के टुकड़े और बचा हुआ भोजन उठाकर एक थाली में रखा और छोटे बेटे को आवाज़ दी, "उठ बेटा, तेरे भाई खा चुके हैं, अब तू भी खा ले।" बेटे ने कहा, "माँ, मुझे भोजन नहीं करना है। मैं परदेस जा रहा हूँ।" माँ ने कहा, "कल जाता हो तो आज ही चला जा।" बेटे ने कहा, "हाँ, आज ही जा रहा हूँ।" और वह घर से निकल पड़ा।

जाते समय उसे अपनी पत्नी की याद आई। पत्नी उस समय गोशाला में उपले थाप रही थी। वह उसके पास गया और बोला, "मैं कमाने के लिए परदेस जा रहा हूँ। कुछ समय बाद लौटूँगा। तुम संतोष से रहना और अपना धर्म निभाना।" पत्नी की आँखें भर आईं। उसने कहा, "आप निश्चिंत होकर जाइए, पर कोई निशानी देते जाइए।" पति के पास और कुछ नहीं था, उसने अपनी अँगूठी उतारकर दे दी और कहा, "तुम भी मुझे कोई निशानी दो।" पत्नी के हाथ गोबर से सने थे। उसने गोबर से भरे हाथ की छाप उसकी पीठ पर लगा दी। पति चल पड़ा।

सेठ के यहाँ नौकरी और बढ़ता धन

चलते-चलते वह बहुत दूर एक बड़े नगर में पहुँचा। वहाँ एक सेठ की बड़ी दुकान थी। उसने सेठ के पास जाकर कहा, "सेठ जी, मुझे काम पर रख लीजिए।" सेठ को भी एक आदमी की ज़रूरत थी। उसने पूछा, "तनख्वाह क्या लोगे?" लड़के ने कहा, "काम देखकर जो उचित लगे, दे दीजिए।" सेठ ने उसे रख लिया।

वह सुबह से रात तक मन लगाकर काम करने लगा। उसकी ईमानदारी और मेहनत देखकर कुछ ही दिनों में वह दुकान का सारा लेन-देन, हिसाब-किताब और ग्राहकों से व्यवहार अच्छी तरह सँभालने लगा। सेठ के सात-आठ नौकर थे, पर सबसे अधिक भरोसा सेठ को इसी पर हो गया। तीन महीने में सेठ ने उसे मुनाफे में आधे का हिस्सेदार बना लिया। कुछ ही वर्षों में वह नगर का एक प्रसिद्ध और धनी व्यापारी बन गया।

पर धन और काम के बीच वह अपने घर को, अपनी माँ को और अपनी पत्नी को बिल्कुल भूल गया। न कोई चिट्ठी भेजी, न कोई पैसा।

बहू के कष्ट के दिन

उधर घर पर उसकी पत्नी पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा। सास और जेठानियाँ उससे घर का सारा भारी काम करातीं। उसे रोज़ जंगल में लकड़ी लाने भेजा जाता। घर के लोग अच्छा भोजन करते, और उसे भूसी की रोटी दी जाती और नारियल के खोपरे में पानी। वह चुपचाप सब सहती रही और पति की राह देखती रही।

एक दिन जंगल से लकड़ी लेकर लौटते समय रास्ते में उसने देखा कि बहुत सी स्त्रियाँ एक जगह बैठी कुछ पूजा कर रही हैं। वह वहीं रुक गई और पूछा, "बहनो, आप यह किस देवता का व्रत कर रही हैं? इसे करने से क्या फल मिलता है और इसकी विधि क्या है? कृपा करके मुझे भी बताइए।"

संतोषी माता के व्रत का ज्ञान

एक स्त्री ने बड़े प्रेम से कहा, "बहन, यह संतोषी माता का व्रत है। ऐसा माना जाता है कि इसे श्रद्धा से करने पर दरिद्रता और चिंता दूर होती है, मन को संतोष मिलता है और माँ अपने भक्तों की मनोकामना पूरी करती हैं।"

फिर उसने विधि बताई: "अपनी सामर्थ्य के अनुसार सवा आने का या जितना हो सके, गुड़ और चना ले लो। हर शुक्रवार को नहा-धोकर संतोषी माता की पूजा करो, गुड़-चना हाथ में लेकर कथा सुनो। बीच में कोई शुक्रवार न छोड़ना और लगातार सोलह शुक्रवार तक व्रत करना। कथा सुनने वाला कोई न मिले तो दीपक जलाकर या किसी चीज़ को सामने रखकर स्वयं कथा कहना। उस दिन खटाई बिल्कुल न खाना और किसी को खटाई देना भी नहीं। दिन में एक बार भोजन करना। जब सोलह शुक्रवार पूरे हो जाएँ, तब उद्यापन करना। उद्यापन के दिन आठ लड़कों को खीर, पूड़ी और चने की सब्ज़ी का भोजन कराना, उन्हें भी खटाई न देना।"

यह सुनकर बहू का मन खिल उठा। रास्ते में उसने लकड़ी का गट्ठर बेचा और जो पैसे मिले, उनसे गुड़-चना ले लिया। उसने मन में व्रत करने का संकल्प किया और आगे चलते हुए संतोषी माता के मंदिर में पहुँची। वहाँ माँ के चरणों में गिरकर बोली, "माँ, मैं कुछ नहीं जानती, न मुझे पूजा की विधि ठीक से आती है। मैं बहुत दुखी हूँ। आपकी शरण में आई हूँ, मेरा दुख दूर करो।" माँ को उसकी भोली भक्ति पर दया आ गई।

पति की चिट्ठी और पैसा

बहू ने पूरे मन से शुक्रवार का व्रत शुरू कर दिया। एक शुक्रवार बीता, दूसरा शुक्रवार आया, तो परदेस से पति का पत्र आ गया। तीसरे शुक्रवार को उसका भेजा हुआ पैसा भी आ गया। यह देखकर जेठ-जेठानियाँ जलने लगीं। वे ताने मारने लगीं, "अब तो इसके पास पैसा आने लगा है, अब इसकी खातिर बढ़ जाएगी।"

बहू सरल मन की थी। वह फिर मंदिर गई और माँ से बोली, "माँ, मैंने आपसे पैसा नहीं माँगा था। मुझे पैसे से क्या काम? मुझे तो अपने पति के दर्शन चाहिए। मेरा सुहाग मेरे पास लौट आए, यही मेरी विनती है।" माँ ने प्रसन्न होकर कहा, "जा बेटी, तेरा पति जल्दी आएगा।" बहू खुशी से भरकर घर लौट आई।

माँ ने सपने में पति को याद दिलाया

संतोषी माता सोचने लगीं कि इस भोली बेटी को मैंने वचन दे दिया है, पर इसका पति तो इसे सपने में भी याद नहीं करता। उसे याद दिलाने के लिए मुझे ही जाना होगा। उस रात माँ उस बेटे के सपने में प्रकट हुईं और बोलीं, "साहूकार के बेटे, सोता है या जागता है?" वह बोला, "माँ, न सोता हूँ न जागता हूँ, बीच में हूँ। कहिए, क्या आज्ञा है?" माँ ने कहा, "तेरा घर-बार है कि नहीं? तेरी पत्नी वहाँ कितना कष्ट सह रही है, कभी उसकी भी सुध ले।"

बेटे को सब याद आ गया। उसने कहा, "माँ, मुझे सब याद है, पर यहाँ मेरा बहुत बड़ा कारोबार फैला है। सेठ का सारा हिसाब चुकाए बिना और माल बेचे बिना मैं कैसे जाऊँ?" माँ ने कहा, "सवेरे नहा-धोकर संतोषी माता का नाम लेकर घी का दीपक जलाना और दुकान पर जाकर बैठ जाना। देखते ही देखते तेरा सारा काम पूरा हो जाएगा।"

सुबह उसने यह सपना सेठ को बताया। सेठ ने भी कहा, "घर-परिवार की सुध लेना तो धर्म है, जाओ।" उसने माँ के कहे अनुसार दीपक जलाया और दुकान पर बैठ गया। थोड़ी ही देर में ग्राहक आने लगे, सारा माल बिक गया, जिनसे पैसा लेना था वे स्वयं देने आ गए, और सेठ की सहायता से साँझ तक सारा हिसाब पूरा हो गया। बेटे ने मन ही मन संतोषी माता को प्रणाम किया, घर वालों के लिए गहने, कपड़े और बहुत सा सामान लिया और घर की ओर चल पड़ा।

घर वापसी और लकड़ी का गट्ठर

उधर बहू रोज़ की तरह जंगल से लकड़ी लेकर लौट रही थी। थककर वह संतोषी माता के मंदिर पर ठहरी। माँ ने उससे कहा, "बेटी, तेरा पति आ रहा है। आज तू लकड़ी के तीन गट्ठर बनाना। एक नदी किनारे रखना, एक मेरे मंदिर पर और एक सिर पर रखकर घर जाना। घर पहुँचकर ऊँचे स्वर में कहना: सासू जी, लकड़ी का गट्ठर लो, भूसी की रोटी दो और नारियल के खोपरे में पानी दो। आज मेहमान कौन आया है?"

उसका पति उसी रास्ते से आ रहा था। नदी किनारे लकड़ी का गट्ठर देखकर वह रुक गया और वहीं विश्राम करने लगा। फिर मंदिर पर भी गट्ठर देखा, तो सोच में पड़ गया। उधर बहू सिर पर गट्ठर रखकर घर पहुँची और आँगन में उसे पटककर माँ के बताए शब्द ज़ोर से कह दिए। सास बात सँभालने के लिए बोली, "बहू, ऐसा क्यों कहती है? तेरा पति आया है। आ, मीठा भात खा और अच्छे कपड़े पहन।"

तभी पति भी घर पहुँच गया। अपनी पत्नी की बात सुनकर और उसकी दशा देखकर वह समझ गया कि उसके पीछे इसके साथ कैसा व्यवहार हुआ है। उसने माँ से पूछा, "माँ, यह कौन है?" माँ बोली, "बेटा, यह तेरी बहू है। दिन भर घूमती रहती है, कोई काम नहीं करती।" बेटे ने कहा, "माँ, मैंने इसे भी देखा है और तुम्हें भी। अब मुझे दूसरे घर की चाबी दो, मैं वहीं रहूँगा।" वह अपनी पत्नी के साथ अलग घर में रहने लगा। जो कुछ लाया था, उससे घर भर गया और दोनों सुख से रहने लगे।

उद्यापन में खटाई और कठिन परीक्षा

सोलह शुक्रवार पूरे होने पर बहू ने पति से उद्यापन की बात कही। पति ने सहर्ष हामी भरी। बहू ने उद्यापन की तैयारी की और जेठ के लड़कों को भोजन का निमंत्रण दिया। जेठानियों के मन में जलन थी। उन्होंने अपने बच्चों को सिखा दिया, "भोजन के समय खटाई माँगना, जिससे इसका उद्यापन पूरा न हो।"

लड़के आए, उन्होंने खीर, पूड़ी और चने की सब्ज़ी पेट भरकर खाई, फिर खटाई माँगने लगे: "हमें खटाई दो, हमें खटाई अच्छी लगती है।" बहू ने कहा, "आज संतोषी माता का उद्यापन है, आज खटाई किसी को नहीं दी जाती।" तब लड़के बोले, "तो हमें पैसे दो।" भोली बहू ने कुछ सोचे बिना उन्हें पैसे दे दिए। लड़कों ने उन पैसों से बाज़ार जाकर इमली खरीदी और खाई। इस प्रकार व्रत का नियम टूट गया।

संतोषी माता अप्रसन्न हो गईं। उसी समय राजा के दूत आए और उसके पति को पकड़कर ले गए। जेठ-जेठानियाँ ताने मारने लगीं, "लूटकर धन लाया था, अब पता चलेगा।" बहू यह सब सह न सकी। वह रोती हुई मंदिर गई और माँ के चरणों में गिरकर बोली, "माँ, यह तूने क्या किया? पहले हँसाकर अब रुला रही हो।"

माँ ने कहा, "बेटी, तूने उद्यापन में मेरा नियम तोड़ा है। तूने लड़कों को पैसे दिए और उन्होंने खटाई खा ली। इतनी जल्दी सब भूल गई?" बहू ने हाथ जोड़कर कहा, "माँ, भूल मुझसे हुई है, पर अनजाने में हुई है। लड़कों ने ज़िद की और मैंने पैसे दे दिए। मुझे क्षमा करो। मैं फिर से तुम्हारा उद्यापन करूँगी।" माँ ने कहा, "जा, अब भूल मत करना। तेरा पति तुझे रास्ते में आता मिलेगा।"

फिर से उद्यापन और माँ की कृपा

बहू घर लौट रही थी कि रास्ते में उसका पति आता हुआ मिल गया। उसने पूछा, "आपको कहाँ ले गए थे?" पति बोला, "जो धन मैं कमाकर लाया था, उसका कर राजा ने माँगा था। वही भरने गया था।" बहू ने माँ को मन ही मन धन्यवाद दिया और दोनों प्रसन्न होकर घर आ गए।

अगले शुक्रवार को बहू ने फिर से पूरे नियम से व्रत किया और उद्यापन की तैयारी की। इस बार उसने ब्राह्मणों के आठ लड़कों को भोजन के लिए बुलाया। उन्हें खीर, पूड़ी और चने की सब्ज़ी खिलाई, खटाई का नाम भी नहीं आने दिया। भोजन के बाद उसने लड़कों को पैसे नहीं, बल्कि एक-एक फल दक्षिणा में दिया, ताकि कोई बाज़ार जाकर खटाई न खरीद ले। इस तरह उद्यापन विधिपूर्वक पूरा हुआ।

संतोषी माता प्रसन्न हुईं। घर में फिर से सुख-समृद्धि लौट आई। कुछ समय बाद माँ की कृपा से बहू को चंद्रमा जैसा सुंदर पुत्र हुआ। वह बेटे को लेकर रोज़ माँ के मंदिर जाने लगी।

माँ का भयानक रूप और सबका कल्याण

एक दिन संतोषी माता के मन में आया कि चलकर देखूँ, यह मेरी बेटी रोज़ मेरे पास आती है, आज मैं इसके घर चलूँ। माँ ने बड़ा भयानक रूप धारण किया: मुँह पर गुड़ और चने लिपटे थे, होंठ सूजे हुए थे और उन पर मक्खियाँ भिनभिना रही थीं। इस रूप में माँ उसकी ससुराल के द्वार पर पहुँचीं।

देहरी पर पैर रखते ही सास चिल्ला उठी, "देखो, कोई चुड़ैल चली आ रही है! लड़कों को भगाओ, नहीं तो यह किसी को खा जाएगी।" बच्चे डरकर भागने लगे और घर के लोग दरवाज़े, खिड़कियाँ बंद करने लगे। बहू ने रोशनदान से झाँककर देखा तो खुशी से चिल्ला उठी, "आज मेरी माता मेरे घर आई हैं!" और दौड़कर बच्चे को माँ की गोद की ओर ले चली।

सास गुस्से में बोली, "इसे देखकर कैसी पगली हो गई है? बच्चे को इसके पास क्यों ले जाती है?" बहू ने विनम्रता से कहा, "सासू जी, जिनका मैं व्रत करती हूँ, ये वही संतोषी माता हैं।" इतना कहकर उसने घर के सारे किवाड़ खोल दिए और माँ का प्रेम से स्वागत किया।

यह सुनकर सबकी आँखें खुल गईं। सास और जेठानियाँ माँ के चरणों में गिर पड़ीं और बोलीं, "माँ, हम मूर्ख हैं, अज्ञानी हैं। हमें तुम्हारे व्रत की विधि नहीं पता थी। हमने तुम्हारा व्रत भंग करके बड़ा अपराध किया है। जगदम्बा, हमें क्षमा करो।" माँ का मन पिघल गया। उन्होंने सबको क्षमा कर दिया और पूरे परिवार को आशीर्वाद दिया। उस दिन से घर में प्रेम, सुख और संतोष बना रहा, और परिवार के सब लोग श्रद्धा से माँ का व्रत करने लगे।

हे संतोषी माता, जैसे तुमने उस बहू पर कृपा की, उसके दुख दूर किए और उसके परिवार को सुख और संतोष दिया, वैसे ही इस कथा को कहने, पढ़ने और सुनने वाले सब भक्तों पर अपनी कृपा बनाए रखना। सबके घर में सुख, शांति और संतोष रहे।

बोलो संतोषी माता की जय!

कथा कैसे सुनें

कथा शुक्रवार की पूजा का मुख्य भाग है। संतोषी माता के चित्र की पूजा के बाद और आरती से पहले कथा पढ़ी या सुनी जाती है। पूजा का पूरा क्रम संतोषी माता व्रत विधि पेज पर दिया गया है; नीचे केवल कथा से जुड़ी बातें हैं। हर परिवार की परंपरा थोड़ी अलग होती है, इसलिए जहाँ अंतर हो, वहाँ अपने घर की रीति मानें।

  1. माँ के सामने जल से भरा कलश रखें, उसके मुँह पर गुड़-चने की कटोरी रखें और घी का दीपक तथा धूप जलाएँ।
  2. दाहिने हाथ में थोड़ा गुड़-चना लें और कथा पूरी होने तक उसे हाथ में रखें। सुनने वाले सभी लोग भी ऐसा कर सकते हैं।
  3. कथा धीरे और साफ स्वर में पढ़ें। परिवार के लोग सुन रहे हों तो ऊँचे स्वर में पढ़ें। सुनने वाला कोई न हो तो बहुत से भक्त दीपक जलाकर उसके सामने कथा कहते हैं, जैसा कथा में स्त्रियों ने बताया है।
  4. बीच में उठने या बात करने से बचें और मन माँ में लगाए रखें।
  5. कथा के अंत में सब मिलकर "बोलो संतोषी माता की जय" कहें, फिर "जय संतोषी माता" आरती गाएँ।
  6. आरती के बाद हाथ का गुड़-चना परंपरा के अनुसार गाय को खिलाया जाता है (या आदर से अलग रख दिया जाता है) और बाकी गुड़-चने का प्रसाद सबको बाँटा जाता है। कलश का जल घर में छिड़का जाता है और बचा जल तुलसी में डाला जाता है।

कथा की सीख याद रखें: व्रत के शुक्रवार को न खटाई खाई जाती है, न किसी को दी जाती है। शुक्रवार पूरे होने पर आठ लड़कों को भोजन कैसे कराएँ और उन्हें पैसे की जगह उपहार क्यों दिया जाता है, यह उद्यापन विधि पेज पर बताया गया है। यही कथा अंग्रेज़ी में भी उपलब्ध है।